Pre-Independence (1937-1945)

A Freedom Fighter

Great personalities are not bound down by whimsical nature of fate. Destiny had much more in store for Babuji than his getting entrapped in a routine stereotyped legal profession. A political career awaited him and he jumped into politics by joining the Freedom Movement on the clarion call of Mahatma Gandhi.

He joined Asodha Satyagraha in Rohtak where he was mercilessly beaten by workers of Unionist Party and hospitalized at Bahadurgarh. The incident caused the Punjab Assembly to amend rules for holding rallies.

Note: The earlier rules permitted dissenting bisvedaars (owners of land) to make noise to disturb and stop the rally organized by opponents.

He was permitted to participate in Individual Disobedience Movement by the Congress Committee appointed by Gandhi ji. He courted arrest on 6.3.41 in his village. He was detained in Gujarat Jail (Pakistan) under Defense of India Rules but was released in September about 6 months later.

He moved to Karnal in early 1942 to start his practice there. He was again arrested on 11.8.42 from Karnal Courts for participating in Quit India Movement and faced persecution and remained in Multan Jail (Pakistan) for 13 months and released on 13-9-1943. On being asked to remove the Gandhi Topi when he along with his friends entered the jail, he refused and preferred to wear the jail clothes as an alternative.  

In an interview given to the District Information Officer, Karnal on 50th anniversary of Independence Babuji recounts:

Asodha Incident: सन् 1938 में जिला रोहतक कांग्रेस ने निर्णय लिया कि वो आने वाले रोहतक जिला बोर्ड के चुनावों में भाग लेगें। इसलिए देहातों में प्रचार का कार्य तेज कर दिया। कांग्रेस के इस कार्यक्र्रम से विरांधी पार्टी जिसे उस समय जमीदारा लीग कहते थे, उन्होंने कांग्रेस के उस देहाती प्रचार को रोकने की अजीब योजना बनाई। उस समय श्यामलात देह जिसमें गौरा देह भी शामिल थी, के मालिक ग्राम पंचायत नहीं बल्कि बिस्सवेदार होते थे। योजना यों बनाई कं अगर कुछ बिसवेदार कांग्रेस का जलसा करवाना चाहते है और गांव के दूसरे बिसवेदार जलसा नहीं करवाना चाहते तो वह जलसे में शोर मचाकर रूकावट ड़ाल सकते थे अर्थात उन्हें रूकावट ड़ालने का अधिकार था। इस योजना को आजमाने का उन्हें मौका तब मिला जब जिला कांग्रेस रोहतक ने असोदा गांव में जलसा करवाने का निर्णय लिया। उस गांव के कुछ बिस्सवेदार कांग्रेस के हक में थें, पंरतु अधिकतर बिस्सवेदार जमीदारों के पक्ष में थे। जलसा शुरू होने पर वे मंच के पास आकर थालीयां बजाने लगते थे। वो समझाने पर भी नहीं मानते थे और पुलिस भी खड़ी तमाशा देखती रहती तो जलसा इस घोषणा के साथ समाप्त कर दिया गया कि कांग्रेस इस गलत और असभ्य तरीके के खिलाफ सत्याग्रह करेगी जब तक उनका जलसा सफल नहीं होगा। इस प्रकार रोहतक जिले में आसोदा सत्याग्रह के नाम से सत्याग्रह षुरू हो गया। दो तीन जलसों में जब इसी प्रकार से शोर मचाया गया तो शोर मचाने वालों को रोका नहीं जा सका, पंरतु हर अगले जलसे में लोगों की भीड़ बढती गई। इस पर जमीदारा लीग के नेताओं को चंता हुई कि उनकी रूकावट से कांग्रेस का प्रचार बंद नहीं हुआ, अपितु ग्रामीण लोगों का ध्यान जमीदारा लीग की बजाय कांग्रेस की ओर होने लगा। इस समय हरियाणा में जमीदारा लीग के नेता सर छोटू राम थे जो पंजाब सरकार के मंत्री भी थें। रोहतक जिले में जमीदारा लीग के नेता चै0 श्रीचंद थे। मगर ये लोग सामने नहीं आते थे। मै स्वंय जलसों में शामिल हुआ और इनकों गांव में कभी नहीं देखा। इसी प्रकार का एक ओर जलसा फरवरी 1939 में रखा गया। पहली शाम को कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ता असोदा गांव में इकट्ठा हो गयें। जलसे वाले दिन सुबह ही जमीदारा लीग के सैकडों कार्यकर्ता कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर टूट पडे। उन्हें लाठियों और तेजधार हथियारों से बुरी तरह मारा गया। मै भी इस हमले में बुरी तरह घायल हुआ। ना केवल मेरे सिर पर लाठी की चोटें आई अपितु षरीर के अन्य भागों पर भी तेजधार हथियारों से चोट आई और मै लहुलुहान होकर बेहोष होकर गिर पडा। मेरी बेहोषी के कारण यह अफवाह फैल गई कि गोहाना का एक वकील मारा गया। ईलाज के लिए मुझे बहादुरगढ़ अस्पताल ले जाया गया। स्वाभाविक था कि इस घटना का शोर न केवल पंजाब विधानसभा में मचा, अपितु सारे हिंदुस्तान में जमीदारा लीग की इस करतूत के खिलाफ आवाज उठी। आखिर में जमीदारा लीग को झुकना पड़ा और असोदा में कांग्रेस का एक भारी जलसा रखा गया, जिसमें श्रीमती सरोजनी नायडू भी षामिल हुई और जलसा पूरी तरह सफल हुआ। किसी विरोधी ने थाली बजाकर विरोध नहीं किया।

इस घटना का मेरे परिवार पर यह असर हुआ कि मेरे माता पिता ने यहां तक कहा कि बेटा हम अपने लालच में तुम्हें रोकते थे। आजादी की लडाई में हिस्सा लेना धर्म का काम है। अब तुम इस काम से पीछे नहीं हटोगे। मेरा घर गोहाना तहसील के स्वतंत्रता सेनानीयों का अड्डा बन गया।

Individual Independence Movement: 1940 के आखिर में गांधी जी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह का आंदोलन शुरू कर दिया। गांधी जी अपने सत्याग्रह मे शामिल होने के लिये उन्ही कार्यकर्ताओ को आज्ञा देते थे जो फार्म भर कर शपथ लेते थे कि वो नशा नही करता, खद्वर पहनता है, चरखा कातता है व सभी धर्मो को समान भाव से देखता है। परमात्मा किऱपा से मेरे जीवन मे ये सभी बाते आचरण मे आ चुकी थी । मैने भी फार्म भर दिया। फार्म की सिफारिश प्रदेश क्रागेस कमेटी करती थी । गांधी जी उसे मजूंर करते थे । मेरे फार्म की मजूंरी फरवरी 1941 मे आई। 5 मार्च 1941 को मेने अपने गांव सिकन्दरपुर माजरा से सत्याग्रह किया। सत्याग्रह की तिथी व स्थान के बाबत जिला मैजिस्टरैट को सूचना दी जाती थी कि सत्याग्रही जलसे मे नारे लगायेगा के हो रहे विश्व युद्व मे वो भरती नही होगे तथा सिपाही नही बनेगे और चन्दा नही देगे। ऐसा करना Defense of India Rules के तहत कानूनी अपराध था । मैने भी इसी प्रकार को एक नोटिस दिया कि मै 5 मार्च 1941 को अपने गांव से सत्याग्रह करूगां। इस लिये गांव मे पुलिस आ गई । चैपाल मे बड़ा भारी जलसा हो रहा था । जब पुलिस ने मुझे गिरफतार किया तो गांव वालो के लिये यह एक सनसनी घटना थी। कितने लोग गांधी जी की जय के नारे लगा रहे थे। अगले दिन मुझे मजिस्टेरट के सामने पेश किया, जिसमे मेरा अपराध स्वीकार करने पर मुझे एक साल की सजा दी गइ। कुछ देर रोहतक जेल मे रहने के बाद मुझे गुजरात जेल, जो अब पाकिस्तान मे है भेज दिया गया। वहां पंजाब व दिल्ली के बडे नेता थे जिनमे लाला अवतार नारायण गुजराल वर्तमान प्रघानमंत्री के पिता, श्री युद्ववीर सिह, पं0 श्री राम शर्मा आदि शामिल थे

Quit India Movement (1942): जनवरी सन 1942 मे मैने करनाल शिफट कर लिया। भारत छोडो अन्दोलन मे अगस्त 1942 मे मुझे गिरफतार कर लिया गया और मुलतान जेल मे बतोर नजरबन्द रखा । मुलतान जेल मे बहुत कांग्रेस मित्र मिले, जिनमे सरदार बच्चन सिह लुधियाना, चै0 साहब राम हरियाणा, चै0 देवी लाल, श्री बलवन्त राय तायल हिसार, श्री महावीर प्रसाद जैन सोनीपत, करनाल जिले के प0 माघो राम शर्मा, डा0 कृष्णा, लाला हरस्वरूप के नाम है।

मुलतान जेल की एक धटना उल्लेखनीय है। श्री वासु देव त्यागी, श्री बानू राम शाहबाद और प0 रघुनंद जी के साथ मुझे मुलतान जेल मे भेजा गया । वहा बेडो मे जाते ही कहा गया कि हम गांधी टोपी पहन कर अन्दर नही जा सकते। हमने इसके खिलाफ चतवजमेज किया और कहा कि हम जरूर गांधी टोपी पहन कर अन्दर जायेगे और अगर हम गांधी टोपी पहन कर नही जा सकते तो हम जेल के कपडे पहन लिये। हम अन्दर गये तो हमारे सभी साथी जो नजरबन्द थे हमारी इस हरकत को देख कर बहुत प्रसन्न हुऐ कि हमने गांधी टोपी की लाज रख ली है ।

जेल मे न मुलाकात की इजाजत थी न लिखने के लिये कलम दवात रखे जा सकते थे। एक रात सुपरीटेडन्ट जेल अपने लावलष्कर के साथ आया और मुझे लिखते हुए देखा तो जेल के नियमो का अपराधी होने के कारण मुझे एक सप्ताह के लिये काल कोठरी मे बन्द कर दिया। आज भी मेरे पास उस समय की धार्मिक पुस्तके है जिनके पेजो के हाशिये पर लिखे मेरे हाथ के नोट मोजूद है।

13.09.1942 को मुझे रिहा कर का दिया ।